Friday, 22 September 2017

उठो लाल अब आँखें खोलो,
पानी लायी हूँ मुंह धो लो।
बीती रात कमल दल फूले,
उसके ऊपर भँवरे झूले।
चिड़िया चहक उठी पेड़ों पे,
बहने लगी हवा अति सुंदर।
नभ में प्यारी लाली छाई,
धरती ने प्यारी छवि पाई।
भोर हुई सूरज उग आया,
जल में पड़ी सुनहरी छाया।
नन्ही नन्ही किरणें आई,
फूल खिले कलियाँ मुस्काई।
इतना सुंदर समय मत खोओ,
मेरे प्यारे अब मत सोओ।

Saturday, 24 June 2017

*Harivansh Rai Bachhan's poem on FRIENDSHIP :*
_________________________________
....मै यादों का
    किस्सा खोलूँ तो,
    कुछ दोस्त बहुत
    याद आते हैं....

...मै गुजरे पल को सोचूँ
   तो, कुछ दोस्त
   बहुत याद आते हैं....

_...अब जाने कौन सी नगरी में,_
_...आबाद हैं जाकर मुद्दत से....😔_

....मै देर रात तक जागूँ तो ,
    कुछ दोस्त
    बहुत याद आते हैं....

....कुछ बातें थीं फूलों जैसी,
....कुछ लहजे खुशबू जैसे थे,
....मै शहर-ए-चमन में टहलूँ तो,
....कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.

_...सबकी जिंदगी बदल गयी,_
_...एक नए सिरे में ढल गयी,_😔

_...किसी को नौकरी से फुरसत नही..._
_...किसी को दोस्तों की जरुरत नही...._😔

_...सारे यार गुम हो गये हैं..._
...."तू" से "तुम" और "आप" हो गये है....

....मै गुजरे पल को सोचूँ
    तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं....

_...धीरे धीरे उम्र कट जाती है..._
_...जीवन यादों की पुस्तक बन जाती है,_😔
_...कभी किसी की याद बहुत तड़पाती है..._
  _और कभी यादों के सहारे ज़िन्दगी कट जाती है ..._😔

....किनारो पे सागर के खजाने नहीं आते,
....फिर जीवन में दोस्त पुराने नहीं आते...

_....जी लो इन पलों को हस के दोस्त,_😁
    _फिर लौट के दोस्ती के जमाने नहीं आते ...._

*....हरिवंशराय बच्चन*


Monday, 19 June 2017

New York is 3 hours ahead of California, but it does not make California slow. Someone graduated at the age of 22, but waited 5 years before securing a good job! Someone became a CEO at 25, and died at 50. While another became a CEO at 50, and lived to 90 years. Someone is still single, while someone else got married. Obama retires at 55, but Trump starts at 70. Absolutely everyone in this world works based on their Time Zone. People around you might seem to go ahead of you, some might seem to be behind you. But everyone is running their own RACE, in their own TIME. Don’t envy them or mock them. They are in their TIME ZONE, and you are in yours! Life is about waiting for the right moment to act. So, RELAX. You’re not LATE. You’re not EARLY. You are very much ON TIME, and in your TIME ZONE Destiny set up for you. In conclusion don't rush to get and don't be sad. Keep sweet smile

Thursday, 4 May 2017

फोटोग्राफर म्हणजे काय.....??

फोटोग्राफर म्हणजे फीरता वारा...

फोटोग्राफर  म्हणजे वाहता झरा...

फोटोग्राफर म्हणजे रात्री एकटाच अंधारात चमकनारा तारा...

 फोटोग्राफर  अंगावरील शहारा...

फोटोग्राफर कार्यक्रमाचा पहारा...

फक्त फोटोग्राफर आहे सुख अन दु:खाचा सहारा...

फोटोग्राफर जन हिताचा नारा...

फोटोग्राफर आहे अनमोल हिरा...

फोटोग्राफर म्हणजे धाक अन् दरारा...

त्याचाच आहे वचक सारा...

काहीही करु शकतो
फोटोग्राफर
जर असेल तो
          खरा...

फोटोग्राफर  वर प्रेम करुन पहा....

एकदा तरी फोटोग्राफर वर प्रेम करुन पहा...

मनापासुन त्याच्यावर तुम्ही मरुन पहा...

               जीवाला जीव देईल तुमच्या
         त्याचा हात धरुन पहा...

              त्याचं नाव काळजावर
         एकदातरी कोरुन पहा...

कसा जगतो एकटा
तुम्ही अवश्य पहा...

प्रेमाचे दोन शब्द
त्याच्याशी बोलून पहा...

          त्याच्या सारख्या यातना
         एकदा तरी सोसुन पहा...

          अनोळखी जगात तुम्ही
           एकटे बसुन पहा...

दु:ख असुन मनात
तुम्ही हसुन पहा...

त्याच्या सारखे तुम्ही
दिवसभर ऊभे राहुन पहा...

         एकदा तरी
फोटोग्राफर वर
          प्रेम करुन पहा...

          तो रोज मरतो तुम्ही
          एकदातरी मरुन पहा...

लेकरासाठी झुरतो तो
तसं भेटीसाठी झुरुन पहा...

तुम्हाला काय वाटतं तुम्ही
फोटोग्राफर च्या यातना सोसुन पहा...


     एकदा तरी   फोटोग्राफर वर...
          तुम्ही प्रेम करुन पहा


Friday, 28 April 2017

ये कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे
ले देती यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती ये कदम्ब की डाली
तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता
वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता
अम्मा-अम्मा कह बंसी के स्वर में तुम्हें बुलाता
सुन मेरी बंसी को माँ तुम इतनी खुश हो जाती
मुझे देखने काम छोड़ तुम बाहर तक आती
तुमको आता देख बांसुरी रख मैं चुप हो जाता
पत्तो में छिपकर धीरे से फिर बांसुरी बाजाता
घुस्से होकर मुझे डाटती कहती नीचे आजा
पर जब मैं न उतरता हंसकर कहती मुन्ना राजा
नीचे उतरो मेरे भईया तुम्हे मिठाई दूँगी
नए खिलोने माखन मिसरी दूध मलाई दूँगी
मैं हंस कर सबसे ऊपर टहनी पर चढ़ जाता
एक बार ‘माँ’ कह पत्तों मैं वहीँ कहीं छिप जाता
बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता
तुम आँचल फैला कर अम्मा वहीं पेड़ के नीचे
ईश्वर से कुछ विनती करती बैठी आँखें मीचे
तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता
तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं
इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
वह देखो माँ आज खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर नए खिलौने लाया है।
हरा-हरा तोता पिंजड़े में गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी हैसर-सर-सर चलने वाली।
सीटी भी है कई तरह की कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक करती चलने वाली रेल।
गुड़िया भी है बहुत भली-सी पहने कानों में बाली
छोटा-सा 'टी सेट' हैछोटे-छोटे हैं लोटा-थाली।
छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं, हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।
मुन्नूौ ने गुड़िया ले ली हैमोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला कहती है माँ se लेने को साड़ी
कभी खिलौनेवाला भी माँ क्याख साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला कभी-कभी दे जाता है।
अम्मा तुमने तो लाकर के मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं, तुम भी मन में करो विचार।
तुम सोचोगी मैं ले लूँगा, तोता, बिल्ली, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी लूँगा, ये तो हैं बच्चों के खेल।
मैं तो तलवार ख़रीदूँगा माँ, या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का, को मारुँगा राम समान।
तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों- को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।
यही रहूँगा कौशल्याऊ मैं तुमको यही बनाऊँगा
तुम कह दोगी वन जाने को हँसते-हँसते जाऊँगा।
पर माँ, बिना तुम्हाेरे वन में मैं कैसे रह पाऊँगा?
दिन भर घूमूँगा जंगल में लौट कहाँ पर आऊँगा।
किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा तो कौन मना लेगा

कौन प्यानर से बिठा गोद में, मनचाही चींजे़ देगा।
कुणीच नाही माझे ..आई
करूणेचे तळहात पोरके ..आई
आकांत श्वासांत , शांतता कुजबुज टाळे माझे ..आई
ना शुन्य आसपास, काळोख मावळे माझे ..आई
असे जवळ - तसे दूर भाबडे अंतराळ माझे ..आई
कुणीच नाही माझे ..आई
करूणेचे तळहात पोरके ..आई
असेल - आहे - असणार, कुणी शब्द गाळले माझे ..आई
अपराध असा परमेशाचा, का? तेज लोपती माझे ..आई
अभेद्य चौकट अश्रुंची, चित्र पुराणे माझे ..आई
कुणीच नाही माझे ..आई
करूणेचे तळहात पोरके ..आई
परिंदे रुक मत तुझमे जान बाकी है,*
*मन्जिल दूर है, बहुत उड़ान बाकी है।*
*आज या कल मुट्ठी में होगी दुनियाँ,*
*लक्ष्य पर अगर तेरा ध्यान बाकी है।*

*यूँ ही नहीं मिलती रब की मेहरबानी*,
*एक से बढ़कर एक इम्तेहान बाकी है।*
*जिंदगी की जंग में है हौसला जरुरी,*
*जीतने के लिए सारा जहान बाकी है।*

Thursday, 27 April 2017

जीवन में चालीस पार का मर्द........

कैसा होता है ?

थोड़ी सी सफेदी कनपटियों के पास,

खुल रहा हो जैसे आसमां बारिश के बाद,

जिम्मेदारियों के बोझ से झुकते हुए कंधे,

जिंदगी की भट्टी में खुद को गलाता हुआ,

अनुभव की पूंजी हाथ में लिए,

परिवार को वो सब देने की जद्दोजहद में,

जो उसे नहीं मिल पाया था,

बस बहे जा रहा है समय की धारा में,

एक खूबसूरत सी बीवी,

दो प्यारे से बच्चे,

पूरा दिन दुनिया से लड़ कर थका हारा,

रात को घर आता है, सुकून की तलाश में,

लेकिन क्या मिल पाता है सुकून उसे,

दरवाजे पर ही तैयार हैं बच्चे,

पापा से ये मंगाया था, वो मंगाया था,

नहीं लाए तो क्यों नहीं लाए,

लाए तो ये क्यों लाए वो क्यों नहीं लाए,

अब वो क्या कहे बच्चों से,

कि जेब में पैसे थोड़े कम थे,

कभी प्यार से, कभी डांट कर,

समझा देता है उनको,

एक बूंद आंसू की जमी रह जाती है,

आँख के कोने में,

लेकिन दिखती नहीं बच्चों को,

उस दिन दिखेगी उन्हें, जब वो खुद, बन जाएंगे माँ बाप अपने बच्चों के,

खाने की थाली में दो रोटी के साथ,

परोस दी हैं पत्नी ने दस चिंताएं,

कभी,

तुम्हीं नें बच्चों को सर चढ़ा रखा है,

कुछ कहते ही नहीं,

कभी,

हर वक्त डांटते ही रहते हो बच्चों को,

कभी प्यार से बात भी कर लिया करो,

लड़की सयानी हो रही है,

तुम्हें तो कुछ दिखाई ही नहीं देता,

लड़का हाथ से निकला जा रहा है,

तुम्हें तो कोई फिक्र ही नहीं है,

पड़ोसियों के झगड़े, मुहल्ले की बातें,

शिकवे शिकायतें दुनिया भर की,

सबको पानी के घूंट के साथ,

गले के नीचे उतार लेता है,

जिसने एक बार हलाहल पान किया,

वो सदियों नीलकंठ बन पूजा गया,

यहाँ रोज़ थोड़ा थोड़ा विष पीना पड़ता है,

जिंदा रहने की चाह में,

फिर लेटते ही बिस्तर पर,

मर जाता है एक रात के लिए,

क्योंकि

सुबह फिर जिंदा होना है,

काम पर जाना है,

कमा कर लाना है,

ताकि घर चल सके,....ताकि घर चल सके.....ताकि घर चल सके।।।।

Wednesday, 26 April 2017

*"'तारीफ़' करती है जिस दिन ये दुनिया 'बहुत' मेरी,*
*मैं घर जाकर 'आईने' में 'असलियत' देख लेता हूँ।*

*मेरी 'आवाज़' कभी उनकी आवाज़ से 'ऊँची' नहीं होती,*
*मैं अपने 'वालिद' की आँखों में अपना 'बचपन' देख लेता हूँ।*

*अपनी 'तन्हाई' पर जब 'तरस' आने लगता है मुझको,*
*मैं 'खिड़की' खोलकर उस 'चाँद' को देख लेता हूँ।*

*बहुत 'बेचैन' हो जाता है जब 'कभी' भी दिल मेरा,*
*मैं 'घर' जाकर अपनी 'माँ' का 'चेहरा' देख लेता हूँ।*

*खुदा से 'शिकायत' नहीं कर पाता मैं किसी 'बात' की,*
*मस्जिद' के रास्ते में रोज़ एक 'ग़रीब' को देख लेता हूँ।*

*इस 'जहाँ' की 'मोहब्बत' जब बहुत 'ज़्यादा' होने लगती है,*
*सड़क' पर पड़े किसी परिंदे का 'घोंसला' देख लेता हूँ।*

*नहीं 'चढ़ता' है मुझ पर कभी दौलत का 'ख़ुमार',*
*अक्सर' किसी 'जनाज़े' को गुज़रते देख लेता हूँ।*

Tuesday, 25 April 2017



_*🔴🎷🌺 *माँ की इच्छा* 🌺🎷🔵*_

_महीने बीत जाते हैं ,_
_साल गुजर जाता है ,_
_वृद्धाश्रम की सीढ़ियों पर ,_
_मैं तेरी राह देखती हूँ।_

_आँचल भीग जाता है ,_
_मन खाली खाली रहता है ,_
_तू कभी नहीं आता ,_
_तेरा मनि आर्डर आता है।_

_इस बार पैसे न भेज ,_
_तू खुद आ जा ,_
_बेटा मुझे अपने साथ ,_
_अपने 🏡घर लेकर जा।_

_तेरे पापा थे जब तक ,_
_समय ठीक रहा कटते ,_
_खुली आँखों से चले गए ,_
_तुझे याद करते करते।_

_अंत तक तुझको हर दिन ,_
_बढ़िया बेटा कहते थे ,_
_तेरे साहबपन का ,_
_गुमान बहुत वो करते थे।_

_मेरे ह्रदय में अपनी फोटो ,_
_आकर तू देख जा ,_
_बेटा मुझे अपने साथ ,_
_अपने 🏡घर लेकर जा।_

_अकाल के समय ,_
_जन्म तेरा हुआ था ,_
_तेरे दूध के लिए ,_
_हमने चाय पीना छोड़ा था।_

_वर्षों तक एक कपडे को ,_
_धो धो कर पहना हमने ,_
_पापा ने चिथड़े पहने ,_
_पर तुझे स्कूल भेजा हमने।_

_चाहे तो ये सारी बातें ,_
_आसानी से तू भूल जा ,_
_बेटा मुझे अपने साथ ,_
_अपने 🏡घर लेकर जा।_

_घर के बर्तन मैं माँजूंगी ,_
_झाडू पोछा मैं करूंगी ,_
_खाना दोनों वक्त का ,_
_सबके लिए बना दूँगी।_

_नाती नातिन की देखभाल ,_
_अच्छी तरह करूंगी मैं ,_
_घबरा मत, उनकी दादी हूँ ,_
_ऐंसा नहीं कहूँगी मैं।_

_तेरे 🏡घर की नौकरानी ,_
_ही समझ मुझे ले जा ,_
_बेटा मुझे अपने साथ ,_
_अपने 🏡घर लेकर जा।_

_आँखें मेरी थक गईं ,_
_प्राण अधर में अटका है ,_
_तेरे बिना जीवन जीना ,_
_अब मुश्किल लगता है।_

_कैसे मैं तुझे भुला दूँ ,_
_तुझसे तो मैं माँ हुई ,_
_बता ऐ मेरे कुलभूषण ,_
_अनाथ मैं कैसे हुई ?_

_अब आ जा तू.._
_एक बार तो माँ कह जा ,_
_हो सके तो जाते जाते_
_वृद्धाश्रम गिराता जा।_
_बेटा मुझे अपने साथ_
_अपने 🏡घर लेकर जा_


Tuesday, 4 April 2017

आए हैं ………………….. आए हैं
आए हैं हम दूर दूर से
सबको ये समझाने
भेद भाव को , मिटा प्यार का
मन में दिये जलाने

हमारा प्यार है अमर
हमारी एक है डगर
हमारा प्यार है अमर
हमारी एक है डगर
आये  हैं आ आ आ ……
आये  हैं ओ ओ ओ ……
अलग अलग है बोली हमारी
अलग अलग भाषाएँ
भिन्न भिन्न हैं जाति धर्म पर
एक ही अभिलाषाएँ  है
देश ही अपना दीं – धर्म हैं
हम तो बस ये गाएँ
हमारा प्यार हैं अमर ………
एक ही माटी  एक ही गुलशन
सारे जुदा जुदा है
रंग – बिरंगे फूल खिलें है
खुशबू जुदा जुदा हैं



जीवन का हर लक्ष्य एक है आए है समझाने
हमारा प्यार है ……….
हिन्दू मुस्लिम सिख फारसी
बौद्ध जैन ईसाई
सबके मन में यही भावना
हम सब भाई भाई
जीवन का हर मेल  एक है हम तो बस यह गाएँ
हमारा प्यार है ……….
एक ही ईश्वर, एक ही मज़हब
अलग – अलग है नाम
खून जो बहता सब की राग में
वह है एक समान
आओ हम सब मिलकर गायें
हमारा देश है महान
हमारा प्यार है अमर…….
नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को।

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को।

प्रभु ने तुमको कर दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को। 

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के 
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को। 

करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो।

Monday, 3 April 2017

Coromandal Fishers

Rise, brothers, rise; the wakening skies pray to the morning light, 
The wind lies asleep in the arms of the dawn like a child that has cried all night. 
Come, let us gather our nets from the shore and set our catamarans free, 
To capture the leaping wealth of the tide, for we are the kings of the sea! 

No longer delay, let us hasten away in the track of the sea gull's call, 
The sea is our mother, the cloud is our brother, the waves are our comrades all. 
What though we toss at the fall of the sun where the hand of the sea-god drives? 
He who holds the storm by the hair, will hide in his breast our lives. 

Sweet is the shade of the cocoanut glade, and the scent of the mango grove, 
And sweet are the sands at the full o' the moon with the sound of the voices we love; 
But sweeter, O brothers, the kiss of the spray and the dance of the wild foam's glee; 
Row, brothers, row to the edge of the verge, where the low sky mates with the sea.